किसानों की समस्या का मूल और इसका निवारण । भाग 1
समय-समय पर किसानों के हक की बात अलग-अलग स्थानों से की जा रही है । कितनी भी व्यवस्थाएं सरकारी कृषकों के लिए कर रही हैं, वह सब एक पुराना और वर्षों से प्रयोग किए जाने वाला तरीका है । अब हमें यह समझना चाहिए जिन तरीकों पर वर्षों से सरकारें चल रही हैं, वह इस परेशानी का हल नहीं है । क्योंकि यदि यह हल होता तो कम से कम किसान तो आज संतुष्ट होते और आज कृषि त्यागने की बात न करते । विभिन्न समय पर किए सर्वेक्षण यह बताते है की समय के साथ कृषि छोडने को तैयार किसानों की संख्या बढ़ती जा रही है । आज लगभग आधे से अधिक किसानी छोडने को, कोई भी दूसरा काम करने को तैयार बैठे हैं । आजतक सरकारों ने सस्ते दामों पर खाद देने की बात कही या यूं कहिए खाद के लिए अनुदान, बिजली के लिए अनुदान इत्यादि दिया है । इसके साथ ही सरकारों ने कृषकों के लिए कुछ समर्थन मूल्य का भी निर्धारण किया है । समय-समय पर समर्थन मूल्य में कुछ बढ़ावा जाता है । मूल रूप से सरकारों ने यही काम किया है और इसी के लिए विभिन्न नीतियाँ बनाई है ।
किसानों के लिए किसी भी प्रकार की नीति बनाने से पहले हमें किसानों की मुख्य समस्याओं को समझना पड़ेगा । इसके लिए सर्वप्रथम यह जानने की आवश्यकता है कि आज किसान क्यों खेती से भाग रहा है ? कृषक की नई पीढ़ी इस काम को करना नहीं चाहती, क्योंकि वह पुरानी पीढ़ी को परेशानी में देखती है, इसके साथ ही पुराने कृषक भी अपनी नई पीढ़ी को कहते हैं किसानी से बेहतर कुछ कर लो अब इसमें कुछ नहीं मिलता है। आप इसको समझने के लिए हमें कुछ बातों को वैश्विक स्तर पर और राष्ट्रीय स्तर पर समझना आवश्यक है । हम पहले तो यह समझे भारत जो एक कृषि प्रधान देश है उसका प्रत्यक्ष सकल घरेलू उत्पाद में 16% का ही योगदान है परंतु कृषि से संबंधित प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार लेने वालों की संख्या लगभग आधी आबादी है । अमेरिका जैसे देश में 2% कृषक पूरे देश के लिए अनाज उत्पन्न करते हैं, इसी प्रकार पूरे विश्व में लगभग आबादी का लगभग 10 प्रतिशत कृषि उत्पाद में लगे होते हैं तो भारत की इतनी अधिक आबादी इस काम में लगी है परंतु ना तो कृषकों को पैसा मिलता है और ना ही वह अपनी खेती को रखना चाहते हैं । आज किसान अपने आपको असहयाय अनुभव करता है । कारण स्पष्ट है कि समय के साथ जितनी उसकी लागत बढ़ती गयी उतनी उसकी आय नहीं बढ़ी है ।
आइए कुछ विशेष बातों पर ध्यान दिया जाए । आज का कृषक अपनी फसल चुनाव किस प्रकार नहीं कर पाता है, उसके लिए लागत मूल्य और बिक्री की व्यवस्था वाली फसल चुनना प्राथमिक कारण बनता है । ध्यान रहे खाद्य पदार्थ और कृषि पदार्थ में जमीन आसमान का अंतर । अनाज से चलकर खाद्य पदार्थ आते-आते उसकी कीमत में कई गुना बढ़ोतरी हो जाती है । परंतु बढ़ोतरी का बहुत कम अंश किसान तक पहुँच पता है। हमारे देश में कृषि द्वारा उत्पादन किए गए सामान का निर्यात में भी उपयोग किया जा सकता है परंतु उसके लिए भी सही ढंग से संकुलन (packing) इत्यादि करनी पड़ती है । इन सबके के कारण आज का युवा किसान अपने आप कृषि क्षेत्र से बाहर शहरों में ले आता है इसके कारण कृषि को के पास खेती के लिए करने वालों की कमी हो जाती है । कई कई स्थानों पर तो हजारों मील दूर से खेती के लिए मजदूर भी बुलाए जाते हैं। अब जो युवा किसान शहरीकरण की चलते शहरों में पहुंच जाती हैं वहां पर, पहली बात उनका प्रशिक्षण शहरी या औद्योगिक घरानों के लिए उपयुक्त नहीं होता, उन्हें वहां कम पगार पर काम करना पड़ता है । हालांकि उनकी पगार, इस पर भी गांव में उनकी कमाई से कहीं अधिक है परंतु शहरों में खर्चा भी अधिक है। यदि आप आंकड़ों में समझना चाहें यह मान लीजिए गांव का किसानी छोड़कर आया युवा शहर में आज भी कुछ समय के बाद अब वापिस अपने गाँव मे 25% कम कमाई रहना पसंद करेगा । परंतु क्योंकि गांव में रोजगार की साधन नहीं है इसलिए मजबूरी में शहर जाना पड़ता है।
बहुत समय से सरकार की नीतियां हर काम के लिए रोजगार उत्पन्न करने के नाम पर बन रही हैं मनरेगा की योजना में यह स्पष्ट बताया गया है जहां तक हो सके मनरेगा में मशीनों के स्थान पर मानव से काम करवाया जाए इससे रोजगार में आने की संभावनाएं अधिक हों । गांव में अब बहुत से लोग मनरेगा योजना में चले आए और उन्होंने किसानी को छोड़ दिया । अब ध्यान रहे मनरेगा से रोजगार देने का प्रयास है वहाँ पर निरंतर रोजगार के अवसर प्रदान करना नहीं । अर्थात सड़क बनी या कोई इमारत बनी उसमे मनरेगा के लोग लगे तो वह इमारत या सड़क तो एक बार ही बननी थी । एक बार का रोजगार तो सरकार ने दिया पर अगले वर्ष क्या होगा ?
अब आइए कुछ आंकड़ों के माध्यम से समझते हैं भारत में सरकार के आंकड़ों के अनुसार औसतन किसान के पास 1.2 हेक्टेयर भूमि है विडंबना यह है 70% से अधिक किसान वह है जिनके पास 1 हेक्टेयर से भी कम भूमि है । भारत में किसान 2.88 टन प्रति हेक्टेयर का अनाज का उत्पादन कर लेता है जबकि विश्व का औसत 3.67 टन प्रति हेक्टेयर है इससे आप समझ सकती हैं भारत का किसान कोई बहुत पीछे नहीं चल रहा जबकि यूरोप के कुछ देश ऐसे हैं जो 6.67 टन प्रति हेक्टेयर मतलब दुनिया से दुगनी तेजी पर चल रहे । भारत में 20 प्रतिशत से अधिक अनाज अपशिष्ट या बेकार हो जाते हैं, उन का सही उपयोग नहीं किया क्या यदि हम उस 20% में आधा भी किसी भी तरीके से प्रयोग में लाएं तो उसका पैसा मिल सकता है । एक और किसानों की समस्या पर आप गौर करें क्योंकि किसान के पास भंडारण की व्यवस्था नहीं है और उसको अब सामान मंडी में बेचना पड़ता है इस कारण से यदि किसी फसल में उसका उत्पाद अधिक होता तो उस फसल की कीमत कम लगती है, यदि उत्पाद कम है तो कीमत अधिक मिलती है । कुल मिलाकर किसान को उतना ही पैसा मिल पाता है चाहे फसल कम हो चाहे ज्यादा । सबसे बड़ा कारण यह है उसके पास भंडारण व्यवस्था सामने नहीं है। अब जिनके पास भंडारण व्यवस्था है वह किसान से सस्ते में अनाज खरीद कर रख लेते है परंतु उपभोक्ता को उसी कीमत पर मिलता है । मतलब सारा पैसा आढ़ती कमा लेते हैं ।
शेष अगला भाग में …..