भाग 1
भारत मे आजकल आर्थिक मंदी की बहुत चर्चा है । अब इसमें अधिकतर लोग, दो भागों में बंट गए हैं । कुछ लोगों का कहना है कि देश आर्थिक मंदी के दौर से गुज़र रहा है, यह सब वह लोग जिनका काम अब की सरकार का विरोध करना है । वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग इस आर्थिक मंदी को मात्र ढकोसला बताते हैं । उनका काम सरकार का समर्थन करना है । दुर्भाग्य से दोनों प्रकार के मुखर लोग अपनी अपनी बातों की दलील भी दे रहे हैं । एक तरफ सकल घरेलू उत्पाद, रोजगार और औद्दयोगिक विकास की दर मे कमी का ब्यौरा दिया गया है और वही पर मात्र धनतेरस पर 12 लाख करोड़ का सोना लोग खरीद लेते हैं । इसी समय भारत मे सेंसेक्स 40000 के पार हो गया है । इस वर्ष 20 लाख से अधिक आईफोन इस देश मे बिकते है । अभी जुलाई की रेपोर्ट के अनुसार पूरे विश्व मे आईफोन की बिक्री 12% कम हो गयी परंतु भारत में 19% बिक्री बढ़ी है । दूसरी तरफ और बेरोजगारी की बात होती है, बहुत से उद्योग बंदी के कगार पर है या बंद हो चुके हैं । इससे लोगों की खरीदने की क्षमता पर प्रभाव पड़ता है । 
ऐसा माना जाता है की जब रोजगार के अवसर कम होते है तो लोगों के पास आय का स्त्रोत घटने लगता है जिसके कारण बेरोजगार लोग कुछ व्यय करने का सामर्थ्य नहीं रखते या उनकी सामर्थ्य कम हो जाती है । इसके चलते लोग केवल आवश्यक वस्तुओं को ही खरीदते हैं । जब बाज़ार मे समान की खपत कम होगी तो, निर्माता उसका उत्पादन कम कर देंगे । इसके चलते कई जगहों पर कारीगरों की छटनी हो जाएगी और कुछ कारखाने बंद हो जाएँगे । इसके साथ ही देश मे बेरोजगारी बढ़ जाएगी । और यही दुष्चक्र फिर से मंदी के आसार को और बढ़ाता है ।
अब आइये बेरोज़गारी की बात करें : रोजगार की तलाश करने वाले युवाओं के बारे मे कुछ समझने के लिए पहले आपको पिछले दो दशकों में आए सामाजिक बदलाव को समझना पड़ेगा । लगभग 20 वर्ष पहले यह तय था की दुकानदार अपने बच्चे को नई दुकान खोल के देता था और सभी औद्योगिक घराने अपने आस पास वालों को उसी व्यवसाय में खपा लेते थे । समय बदला और दुकानदारों के लिए अब लाभ का प्रतिशत कम होने लगा और उन्हे लगा की अब पढ़ाई के बिना कुछ नहीं हो सकता तो अपनी नई पीढ़ी को उन्होने शिक्षित करना शुरू कर किया । उस समय की मंदी को देखते हुए बहुत से औद्योगिक घरानों ने निजी शिक्षण संस्थान खोलने शुरू कर दिये । और सरकार ने उसके लिए प्रावधान भी किए ।

90 के दशक में लगभग 20000 इंजीन्यरिंग की सीटें थी और देश को लगभग इतनी ही इस क्षेत्र के स्नातकों की आवश्यकता थी । तो जो पढ़ा उसे अच्छी नौकरी मिल जाती थी । लेकिन इसी क्षेत्र में आज देश में लगभग 40000 इंजीनियर की आवश्यकता है । परंतु 16 लाख से अधिक इंजीनियर आज प्रति वर्ष बनाए जा रहे हैं । इसी के साथ दूसरे प्रॉफेश्नल कोर्स आप देखें तो 35 लाख विद्यार्थी उत्तीर्ण हो रहे हैं । यदि कुल स्नातक देखें तो 50 लाख के पार हैं । अब जब 50 लाख विद्यार्थी शिक्षित आएंगे और बाज़ार में कुल लगभग 5 लाख नौकरियाँ हैं तो प्रतिवर्ष आप 35 लाख से अधिक बेरोजगार पैदा करते रहे । लगभग 20 वर्षों में सेवा क्षेत्र ने नए आयाम जोड़े । इसी कारण नए रोजगार के अवसर आए । परंतु कुछ समय यानि लगभग 2017 के बाद स्थिति भयावह होने लगी । निजी संस्थान मात्र फीस ले कर युवाओं को पढ़ाते रहे ।बार बार अनेक औद्योगिक सलाहकार, शिक्षाविद और समाज शास्त्री इस नयी शिक्षा प्रणाली, जिसके तहत निजी संथाओं को नए विश्वविद्यालय बनाने तक का अधिकार दे दिया गया, के विषय में कहते रहे । परंतु सरकारों ने आंखें मूंद रखी थी । ऐसा नहीं है की नए रोजगार के अवसर नहीं आए, परंतु रोजगार से अधिक पढे लिखे युवा सामने आते गए । Kotak के एक सर्वे के अनुसार पढे लिखे बेरोजगारों की वृद्धि अधिक हुई है ।

इसके साथ एक और अंतर आ गया कि जब तक मात्र सरकारी संस्थान थे उन विद्यालयों में हर मेधावी छात्र लगभग न के बराबर धन व्यय करता था । अब निजी संतानों के आने के बाद एक शिक्षार्थी पर कई गुणा खर्च होने लगा । उदाहरण के लिए एक सरकारी संस्थान से इंजीनियर बनने का शुल्क है 3 लाख रुपये परंतु निजी क्षेत्र में आज लगभग 12 लाख रुपये खर्च करके इंजीनियर बनता है और इसी कारण उस स्नातक को अब अधिक पगार चाहिए क्योंकि उसने खर्चा कई गुणा ज़्यादा किया है । परंतु उद्योग जगत उनको नौसिखिया मानता है और इतनी पगार नहीं देता । बार बार कई रेपोर्ट यह बता चुकी हैं, कि 90% से अधिक इंजीनियर नौकरी करने की दक्षता नहीं रखते हैं। इसी के साथ एक बात को समझें कि हमारे देश मे शिक्षा अर्थ क्यूंकी नौकरी से ही नापा जाता है, अच्छी नौकरी प्रदान करवाने वाला संस्थान बेहतर माना जाने लगा । इसके साथ ही निजी क्षेत्र के प्रवेश करे के बाद उन संस्थानों के शुल्क मे कई गुणा वृद्धि हो गयी । जब यह प्रश्न आया कि इसमें विद्यार्थी कैसे पढ़ेंगे तो सरकार ने देशी और विदेशी बैंक के माध्ययम से शिक्षा कर्ज़ दिलवाने का प्रबंध किया गया । अब इसका दुष्प्रभाव समझें कि जब 10 लाख रुपये आप बैंक से कर्ज़ पर लेते हैं तो यदि आपको उसका मूल धन और ब्याज चुकाना है तो 10 साल के समय के अनुसार भी आपको 15000 प्रति माह की किश्त चुकनी है । इसके लिए भी युवा को कम से कम 40000 प्रति माह की नौकरी चाहिए जो आज है नहीं । अब ऐसे में शिक्षित युवा बेरोजगार ही होगा । अब प्रतिवर्ष शिक्षण ऋण की 16% से अधिक की बढ़ोत्तरी देखि जा रही है । इसके साथ ही 1 लाख करोड़ के आसपास इस समय बैंक पर इसके कारण गैर निष्पादित संपत्ति यानि NPA है ।
अभी कल का ही जनसत्ता का समाचार है कि 6 साल में 90 लाख नौकरियाँ घटी हैं । 2011 का 90 लाख का बेरोजगारी का आंकड़ा आज 2018 में 2.5 करोड़ को पार कर गया है । कृषि क्षेत्र में रोजगार 23.2 करोड़ से घाट कर 20.3 करोड़ हो गया है। सेवा के क्षेत्र में रोजगार 12.7 करोड़ से 14.4 करोड़ हो गया ।
इसीलिए अब सरकार को अब कौशल बढ़ाने के लिए एक नयी योजना का गठन करना पड़ा, पर वह भी कितना कारगर है , समय ही बताएगा । तो यह स्पष्ट है कि आज बेरोजगारी आपकी गिनती मे भले ही आज आई है परंतु यह एक दिन का नहीं अपितु वर्षों से बनी नीतियों का दुष्परिणाम आपके सामने आया है ।